Tuesday, 31 March 2026

गज़ब हो गया - पंकज उधास - तरन्नुम (Vol.1)

 ग़ज़ल: गज़ब हो गया

गायक: पंकज उधास

संग्रह: तरन्नुम (Vol.1)

साल: १९८४

गीत: मुमताज़ राशिद


चाँदनी रात में चाँद के सामने

रुख़ से परदा हटाना गज़ब हो गया

चाँदनी रात में चाँद के सामने

रुख़ से परदा हटाना गज़ब हो गया

चाँदनी छुप गयी चाँद शरमा गया

चाँदनी छुप गयी चाँद शरमा गया

आपका मुस्कुराना ग़ज़ब हो गया

चाँदनी रात में चाँद के सामने

रुख़ से परदा हटाना गज़ब हो गया

चाँदनी रात में


दिल की धड़कन मेरी तेज़ होने लगी

रात आँखों में काँटे चूभोने लगी

दिल की धड़कन मेरी तेज़ होने लगी

रात आँखों में काँटे चूभोने लगी

वस्ल की रात में बात ही बात में

वस्ल की रात में बात ही बात में

यूँ तेरा रूठ जाना गज़ब हो गया

चाँदनी रात में चाँद के सामने

रुख़ से परदा हटाना गज़ब हो गया

चाँदनी रात में


झूम कर काली काली घटा जब उठी

रात अपनी तो करवट बदलते कटी

झूम कर काली काली घटा जब उठी

रात अपनी तो करवट बदलते कटी

कुछ तो मौसम ने बेचैन रखा हमें

कुछ तो मौसम ने बेचैन रखा हमें

कुछ तेरा याद आना गज़ब हो गया

चाँदनी रात में चाँद के सामने

रुख़ से परदा हटाना गज़ब हो गया

चाँदनी रात में


अपने हिस्से में तूफ़ा की तक़दीर थी

ज़िंदगी अपनी मौज़ो की ज़ंजीर थी

अपने हिस्से में तूफ़ा की तक़दीर थी

ज़िंदगी अपनी मौज़ो की ज़ंजीर थी

डूब जाने का अपने हमें ग़म ना था

डूब जाने का अपने हमें ग़म ना था

उसका साहिल पे आना गज़ब हो गया

चाँदनी रात में चाँद के सामने

रुख़ से परदा हटाना गज़ब हो गया

चाँदनी छुप गयी चाँद शरमा गया

चाँदनी छुप गयी चाँद शरमा गया

आपका मुस्कुराना गज़ब हो गया

चाँदनी रात में चाँद के सामने

रुख़ से परदा हटाना गज़ब हो गया

चाँदनी रात में

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Saturday, 28 March 2026

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

ग़ज़ल: एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

गायक: पंकज उधास

संग्रह: नायाब

साल: १९८५

गीत: ज़फ़र गोरखपुरी


तेरी निगाह से ऐसी शराब पी मैने की

फिर ना होश का दावा किया कभी मैने

वो और होंगे जिन्हें मौत आ गई होगी

निगाहें यार से पाई है ज़िंदगी मैने


ऐ गम-ए-ज़िंदगी कुछ तो दे मशवरा

ऐ गम-ए-ज़िंदगी कुछ तो दे मशवरा

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

मैं कहाँ जाऊँ होता नहीं फ़ैसला

मैं कहाँ जाऊँ होता नहीं फ़ैसला

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा


एक तरफ बाम पर कोई गुलफाम है

एक तरफ महफिलें बादा-ओ-जाम है

एक तरफ बाम पर कोई गुलफाम है

एक तरफ महफिलें बादा-ओ-जाम है

मेरा दोनोसे है कुछ ना कुछ वास्ता

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा


उसके दर से उठा तो किधर जाऊँगा

मयकदा छोड़ दूँगा तो मैं मर जाऊँगा

उसके दर से उठा तो किधर जाऊँगा

मयकदा छोड़ दूँगा तो मैं मर जाऊँगा

उसके दर से उठा तो किधर जाऊँगा

मयकदा छोड़ दूँगा तो मैं मर जाऊँगा

सख़्त मुश्किल में हूँ क्या करूँ ऐ खुदा

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा


ज़िंदगी एक है और तलबगार दो

जां अकेली मगर जां के हक़दार दो

ज़िंदगी एक है और तलबगार दो

जां अकेली मगर जां के हक़दार दो

दिल बता पहले किसका करूँ हक अदा

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा


इस ताल्लूक को मैं कैसे तोडूँ ज़फर

किसको अपनाऊँ मैं किसको छोडूँ ज़फ़र

इस ताल्लूक को मैं कैसे तोडूँ ज़फर

किसको अपनाऊँ मैं किसको छोडूँ ज़फ़र

इस ताल्लूक को मैं कैसे तोडूँ ज़फर

किसको अपनाऊँ मैं किसको छोडूँ ज़फ़र

मेरा दोनोसे रिश्ता है नज़दीक का

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

ऐ गम-ए-ज़िंदगी कुछ तो दे मशवरा

ऐ गम-ए-ज़िंदगी कुछ तो दे मशवरा

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

मैं कहाँ जाऊँ होता नहीं फ़ैसला

मैं कहाँ जाऊँ होता नहीं फ़ैसला

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

Thursday, 26 March 2026

जिसको देखो मय-कदे की सिम्त भागा आए हैं - ज़फ़र गोरखपुरी - पंकज उधास

ग़ज़ल: जिसको देखो मय-कदे की सिम्त भागा आए हैं

गायक: पंकज उधास

संग्रह: शगुफ्ता

साल: १९८८

गीत: ज़फ़र गोरखपुरी


ये शराब-ए-नाब, ये मस्तों की मंज़ूर-ए-नज़र

क्या मुबारक शय थी, जिनसे आम होकर रह गई

जब से कम-ज़र्फ़ों के पल्ले पड़ गई ये दिलरुबा

कूचा-ओ-बाज़ार में बदनाम होकर रह गई


जिसको देखो मय-कदे की सिम्त भागा आए हैं

जिसको देखो मय-कदे की सिम्त भागा आए हैं

किसका-किसका ग़म करेगी दूर बेचारी शराब

पीने वालों को बहकते देख के शरमाए हैं

किसका-किसका ग़म करेगी दूर बेचारी शराब

किसका-किसका ग़म करेगी दूर बेचारी शराब


क्या सलीक़ा था, कभी जब जाम छलकाते थे लोग

इसमें भी एक शान थी, जब पी के लहराते थे लोग

इक्का-दुक्का छुप-छुपा कर इस तरफ़ आते थे लोग


अब तो इस माशूक़ पे हर शख़्स की नियत ख़राब

किसका-किसका ग़म करेगी दूर बेचारी शराब

किसका-किसका ग़म करेगी दूर बेचारी शराब


वक़्त के मारे हुए, कुछ इश्क़ के मारे हुए

कुछ ज़माने से, कुछ अपने आपसे हारे हुए

लोग तो इस मय के आशिक़ जानकर सारे हुए


कोई दो क़तरों का तालिब, कोई माँगे बेहिसाब

किसका-किसका ग़म करेगी दूर बेचारी शराब

जिसको देखो मय-कदे की सिम्त भागा आए हैं

किसका-किसका ग़म करेगी दूर बेचारी शराब


जो असीर-ए-ग़म हुआ, उसको तो अक्सर चाहिए

जिसको कोई ग़म नहीं, उसको भी सागर चाहिए

जिसको एक क़तरा मिला, उसको समंदर चाहिए


एक नाज़ुक सी परी झेलेगी कितनों के 'अज़ाब

किसका-किसका ग़म करेगी दूर बेचारी शराब

किसका-किसका ग़म करेगी दूर बेचारी शराब


राह तकता होगा कोई, दिल का नज़राना लिए

ज़ुल्फ़ में मस्ती लिए, होंठों पे पैमाना लिए

प्यास आँखों में लिए, आँचल में मयख़ाना लिए


मय-कदे की राह छोड़ो, घर चलो, 'आली-जनाब

किसका-किसका ग़म करेगी दूर बेचारी शराब

जिसको देखो मय-कदे की सिम्त भागा आए हैं

किसका-किसका ग़म करेगी दूर बेचारी शराब


पीने वालों को बहकते देख के शरमाए हैं

किसका-किसका ग़म करेगी दूर बेचारी शराब

किसका-किसका ग़म करेगी दूर बेचारी शराब

किसका-किसका ग़म करेगी दूर बेचारी शराब

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